गरिमा लोकतंत्र की
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनावी आगाज 2024
लोकतंत्र में दफन फाइल को निकालकर उस पर संप्रदायिक दंगों की आग में दोबारा चल चित्र के माध्यम से धड़का ना कहीं 2024 का आगाज तो नहीं ।क्या ?लोकतंत्र में चुनाव जीतना इतना जरूरी है एक तरफ नफरत के बीज युवा पीढ़ी के जेहन में बोकर फसल काट ली जाए ।क्या ?आज सभी पत्रकार व शासन प्रशासन में बैठे लोग सत्ता के साथ हो जाते हैं ।क्या एक हाथ में मत दूसरे हाथ में तलवार लेकर चलना। क्या यही लोकतंत्र की परिभाषा है ?दंगे चाहे कोलकाता में हो या राउरकेला में या अयोध्या में दंगे गुजरात में दंगे हो या शामली में हमेशा कुछ ही लोगों का फायदा उठाने का वक्त आ जाता है। दंगा में जो लोग विस्थापित होते हैं ।वह दंश पीढ़ियों तक नहीं जाता ।क्या आज धन कमाने के लिए जो कुछ भी सिनेमाघरों पर दिखाया जाता है वह सही है?
यदि कभी दंगे हुए ।तो उसमें किन लोगों की आहुति दी उन दंगों में प्रजापति कश्यप पाल मल्हा धीमान विश्वकर्मा बाल्मीकि छोटे मुस्लिमों की आहुति दी जाती है। दंगा चाहे मेरठ का हो या शामली का मगर उस पर राजनीति की रोटी ठाकुर और ब्राह्मण ही सेखते हैं। उस पर राजनीति करने वाले लोग हमेशा बड़े नेता सामने आ जाते हैं। मुझे लगता है अयोध्या मंदिर का कारसेवक। जिक्र होना चाहिए।
किसी भी नेता की जेहन में नहीं है कारसेवक धीमान पाल कश्यप कुमार गडरिया धनगर आदि जातियों से थे ।एक राजनीतिक दल के बहकावे में आकर आक्रोशित होकर झंडा उठाकर चले गए थे। बहुत से कारसेवक मारे गए थे भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई ।कारसेवक को आज तक कुछ नहीं मिला।
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