अखिलेश जीतकर भी कुछ इस तरह हार गये, कारण भागीदारी संकल्प मोर्चा के घटक दलों की घोर उपेक्षा
अखिलेश जीतकर भी कुछ इस तरह हार गये, कारण भागीदारी संकल्प मोर्चा के घटक दलों की घोर उपेक्षा
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को एकतरफा जीत मिली थी, जिसमें विपक्ष सहित क्षेत्रीय दलों को मोदी लहर में काफी नुकसान उठाना पड़ा था और सत्ता से बड़बोलपन के कारण लोकसभा चुनाव होते ही कैबिनेट से निष्कासित किये गये ओम प्रकाश राजभर जी भाजपा से बदला लेने को तड़प रहे थे। 2019 में मुॅह की खाने के बाद ओम प्रकाश राजभर जी के लिए 2022 की लड़ाई बहुत कठिन होने वाली थी। ऐसे में 2022 में ओम प्रकाश राजभर जी ने एक रणनीति बनायी और उसमें सर्वप्रथम उस रणनीति का हिस्सा बनाया भागीदारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रेमचन्द्र प्रजापति जी को जो वर्ष 2017 से भागीदारी आन्दोलन मंच बनाकर लगातार कुम्हारों, जिनकी आबादी उप्र में लगभग 12 प्रतिशत है, सहित अन्य पिछड़ों दलितों की भागीदारी हेतु संघर्ष कर रहे थे। तत्पश्चात, पूर्व कैबिनेट मंत्री, बाबू सिंह कुशवाहा, कृष्णा पटेल, बाबूराम पाल, रामसागर बिन्द, रामकरण कश्यप, अनिल सिंह चौहान, केवट रामधनी बिन्द एवं असासुद्दीन औवैसी एवं इनके क्षेत्रीय दलों को मिलाकर एक मोर्चा तैयार किया गया, जिसे भागीदारी संकल्प मोर्चा का नाम दिया गया और फरवरी 2020 में इसकी पहली विशाल जनसभा रखी गयी तत्पश्चात कोरोना के कारण शिथिलता आ गयी। लेकिन दिन प्रतिदिन भागीदारी संकल्प मोर्चा के घटक दलों की संयुक्त जनसभाओं के कारण मोर्चे का ग्राफ लगातार बढ़ता ही गया और 2022 चुनावों से 06 माह पहले मोर्चे का ग्राफ अपने चरम पर था, जब देश प्रदेश के प्रत्येक चैनल, अखबारों में मोर्चे में ओवैसी के भी आ जाने के कारण भागीदारी संकल्प मोर्चा की चर्चा चरम पर थी और उप्र में मोर्चा अपनी खुद की सरकार बनाकर 5 साल में 5 अलग अलग जाति के मुख्यमंत्री और 20 उप मुख्यमंत्री वाले फार्म्यूले को लेकर जन जन तक अपनी पहुॅच बना चुका था। मोर्चे के जन जन तक पहुॅचने के कारण सभी पार्टियां मोर्चे के लोगों से सम्पर्क साधकर अपने अपने पाले में मोर्च को लाने हेतु सक्रिय हो गयीं, इनमें भाजपा, बसपा, कांग्रेस, सपा प्रमुख रूप से थीं। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था, ओम प्रकाश राजभर जी द्वारा बाबू सिंह कुशवाहा, कृष्णा पटेल, ओवैसी आदि को विश्वास में न लेकर उनकी उपेक्षा करके मोर्चे की दिशा तय की जाने लगी, जिसे भॉपकर पहले बाबू सिंह कुशवाहा और फिर कृष्णा पटेल जी, रामकरण कश्यप जी एवं ओवैसी मोर्चे से अलग हो गयें। जिसमें बाबू सिंह कुशवाहा जी ने ओैवैसी के साथ मिलकर एवं एवं कृष्णा पटेल जी ने सीधे समाजवादी पार्टी से गठबन्धन कर चुनाव लड़ा। इनके मोर्चे से अलग होने के बाद मोर्चे में मात्र ओम प्रकाश राजभर, प्रेमचन्द्र प्रजापति, बाबूराम पाल, रामसागर बिन्द एवं अनिल सिंह चौहान की पार्टियां ही शेष रह गयी। इन सभी का अपने अपने समाज पर मजबूत पकड़ है। अब समय आ गया था कि ओम प्रकाश राजभर जी ने भी अखिलेश यादव के साथ गठबन्धन का फैसला कर लिया और अखिलेश की हार का शंखनाद यहीं से हो गया, क्योकि मोर्चे की अन्य पार्टियांें के नेताओं के साथ उदयवीर सिंह जी, जो अखिलेश के दूत बनकर मोर्चे के नेताओं से मिले थे, मोर्चे के नेताओं में प्रेमचन्द्र प्रजापति ने गठबन्धन की स्थिति में 10 सीट, बाबूराम पाल ने 20 सीट, रामसागर बिन्द एवं अनिल सिंह चौहान ने भी 10, 10 का दावा उदयवीर जी के माध्यम से अखिलेश जी से किया। जिसपर चर्चा कर सीट फाइनल करने पर सहमति बनी। इसी के तत्काल पश्चात ओम प्रकाश राजभर जी द्वारा एकाएक अखिलेश जी से गठबन्धन कर लिया गया और यह गठबन्धन भागीदारी संकल्प मोर्चा का ना होकर ओम प्रकाश राजभर जी की पार्टी सुभासपा मात्र का गठबन्धन था, जिसे सपा सुभासपा गठबन्धन करार दिया गया। मोर्चे के अन्य नेताओं बाबूराम पाल, प्रेमचन्द्र प्रजापति, रामसागर बिन्द, अनिल सिंह चौहान को घोखे में रखकर राजभर जी द्वारा मात्र अपनी पार्टी का गठबन्धन किया गया। जबकि उदयवीर सिंह द्वारा मोर्चे के अन्य दलों को सीटों के नाम पर भ्रमित किया जाता रहा। ओम प्रकाश राजभर जी द्वारा मीडिया में एक भी सीट न लेने की बात कही जाती रही लेकिन मामला 18 सीटों पर तय हुआ था। जिसमें 10 सीट ओेम प्रकाश राजभर जी की एवं 8 सीट मोर्चे के अन्य घटक दलों में प्रत्येक की 2,2 सीट थीं। किन्तु ओम प्रकाश राजभर जी ने तो अपनी ही घटक दलों से छल करने और अखिलेश यादव की जी नॉव को डुबोने का मन बना लिया था। अन्ततः एक भी सीट न मिलने पर बाबूराम पाल मोर्चे से अलग हो गये, जिससे पाल समाज में अखिलेश विरोधी संदेश गया, बाबूराम पाल जी ने अपने प्रत्याशी भी मैदान में उतार दिये जिन्होने वोट काटने का काम किया, इसी तरह अनिल सिंह चौहान और रामसागर बिन्द भी मोर्चे में सीट न मिलने के कारण अलग हो गये। मोर्चे के सबसे मजबूत उत्तर प्रदेश के 12 प्रतिशत कुम्हारों सहित पिछड़ो, दलितों सभी वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली भागीदारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रेमचन्द्र प्रजापति फिर भी मजबूती से डटे रहे। हांलाकि भागीदारी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं तथा प्रजापति समाज में अखिलेश जी एवं ओम प्रकाश राजभर द्वारा भागीदारी पार्टी की जिस प्रकार से एक भी सीट ना देकर अपेक्षा की गयी, उससे सम्पूर्ण प्रजापति समाज में घोर रोष व्याप्त था। यही हाल बिन्द, पाल और चौहान समाज का भी था, जिन्होने इसी रोष के कारण अखिलेश जी को मुख्यमंत्री बनने से वंचित कर दिया। अखिलेश भी कहीं न कहीं अतिविश्वास एवं अन्धविश्वास के कारण ठगे गये। क्योकि उन्होने सीटें तो 18 दी, लेकिन उन 18 सीटों को देने के बाद उन्हें जो लाभ मिलना चाहिए था वह ओम प्रकाश राजभर जी के कारण मोर्चे के अन्य दलों को 01 भी सीट न देने के कारण नहीं मिल सका। परिणामस्वरूप प्रदेश की लगभग 80 से ज्यादा विधानसभाओं में मात्र 2000 के अन्तर से अखिलेश सीटों को हार गये। यदि मोर्चे के इन घटक दलों को 02, 02 सीटें भी दे दी गयी होतीं तो प्रजापति, पाल, चौहान समाज पूरी तनमयता के साथ अखिलेश जी को मुख्यमंत्री बनाने में लगता और जो वोट इन समाजों ने काटा उसे अखिलेश जी को देकर सपा गठबन्धन की सरकार बनवाता। खैर इस सबके बीच ओम प्रकाश राजभर जी ने इन घटक दलों को गटककर अपना उल्लू सीधा कर लिया, जिसकी कीमत अखिलेश जी को अपनी हार से चुकानी पड़ी। आज बाबूराम पाल, प्रेमचन्द्र प्रजापति, रामसार बिन्द, अनिल सिंह चौहान निकल पड़े हैं फिर अपने समाज को जगाने, समाज को सावधान और एकजुट करने। 2024 मे ंयह छोटे दल निश्चित रूप से बड़ा काम करेंगें। अखिलेश जी को चाहिए मंथन और चिंतन करें तथा भविष्य में ऐसी गलती कभी न करें। दुश्मन पर नजर रखें लेकिन मित्र के रूप में बने दुश्मन पर अधिक नजर रखें।
स्वतंत्र पत्रकार रामसागर पाल की कलम से।
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